गुरु कृपा
गुरु बिन घट अँधियार है, गुरु बिन सूझे न राम। गुरु कृपा जब बरसती, जगमग होय धाम॥ गुरु सोई जो राम दे, काटे मन की फाँस। जीवन सार्थक हो उठे, मिटे जन्म की प्यास॥ गुरु चरणन की धूलि से, निर्मल होय विचार। मन-मंदिर में राम बसें, मिटे सकल अँधियार॥ गुरु गोविंद एक रस, भेद न मानै कोय। जिन अंतर अनुभव भयो, तिन परम सुख होय॥ "कबीर जी की शैली से प्रेरित मौलिक दोहे"