क्रोध-करुणा की यात्रा!

मनुष्य का जीवन संबंधों की डोर से बँधा होता है। परिवार, पड़ोस और समाज—यही हमारे रोज़मर्रा के संसार की संरचना करते हैं। लेकिन जब इन्हीं संबंधों में बार-बार लड़ाई, कटु शब्द और क्रोध प्रवेश कर जाता है, तब जीवन की शांति धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
अक्सर ऐसा होता है कि किसी दिन घर या आस-पड़ोस में विवाद हो जाता है। उस समय आवेश में कही गई बातें उस पल को तो पार कर देती हैं, लेकिन उनका वास्तविक प्रभाव अगले दिन दिखाई देता है। सुबह उठते ही जब हम फिर उसी व्यक्ति का चेहरा देखते हैं, जिससे कल तकरार हुई थी, तो मन में अनायास क्रोध जाग उठता है। नकारात्मक विचार हमारे मस्तिष्क में प्रवेश कर जाते हैं और पुरानी बातों को बार-बार दोहराने लगते हैं। यही क्रम यदि लगातार चलता रहे, तो कुछ ही दिनों में एक और लड़ाई होना स्वाभाविक हो जाता है।
धीरे-धीरे यह स्थिति जीवन की आदत बन जाती है। क्रोध, नाराज़गी, गलत विचार और कठोर शब्द हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। परिणामस्वरूप हमारा आचरण भी बिगड़ने लगता है। हम यह भूल जाते हैं कि जैसी हमारी सोच होती है, वैसा ही हमारा व्यवहार बनता है, और वही व्यवहार हमारे जीवन की दिशा तय करता है।
जब हमें यह ज्ञात है कि हमें पूरी उम्र इन्हीं लोगों के साथ रहना है, रोज़ एक-दूसरे का सामना करना है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि बार-बार लड़ाई करके हम क्या हासिल करते हैं? यह भी एक सच्चाई है कि हर व्यक्ति हमें पूरी तरह समझे, यह संभव नहीं। न ही हम हर किसी की अपेक्षाओं पर खरे उतर सकते हैं। फिर भी, यदि हर असहमति को संघर्ष का रूप दे दिया जाए, तो जीवन का अधिकांश हिस्सा शिकायतों, तनाव और मायूसी में ही बीत जाएगा।
इसके विपरीत, यदि हम बिना लड़ाई के साथ रहना सीख लें, तो जीवन की गुणवत्ता अपने आप बेहतर होने लगती है। यह सहनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि मानसिक परिपक्वता का प्रतीक है। शांत मन से जीया गया जीवन सकारात्मक सोच को जन्म देता है। जब विचार सकारात्मक होते हैं, तो आचरण भी सहज और सौम्य बनता है।
ऐसे जीवन में आत्मा प्रसन्न रहती है और मनुष्य दुनिया के अनेक रंगों को पहचान पाता है। छोटी-छोटी खुशियाँ अर्थपूर्ण लगने लगती हैं। जबकि लगातार लड़ाई में उलझा जीवन हमें भीतर से थका देता है और हमारी ऊर्जा को नकारात्मकता में नष्ट कर देता है।
अतः आवश्यक है कि हम प्रतिक्रिया देने से पहले ठहरना सीखें। हर बात का उत्तर क्रोध से देना आवश्यक नहीं। समझदारी, धैर्य और मौन कई बार सबसे प्रभावी समाधान होते हैं। वास्तव में, लड़ाई से नहीं, बल्कि संतुलन और सकारात्मक सोच से ही जीवन सुंदर और सार्थक बनता है।

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