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जय हिन्द

सब चंगा जी!

जब भी समस्याएं तराजू पर बैठती हैं, तुम मेरे अतीत के बट्टे लाकर रख देते हो, और सब ठीक हो जाता है। जैसे! बेरोज़गारी आए  तो...... सल्फ! बिजनेस का पाठ पढ़ाते हो। जब बात चुनाव की आती है  तो----- पांच साल की पगार एक बारी में दे जाते हो।  बात जब-----  पानी, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा की हो, तो...... इतिहास के सर मढ़ देते हो, जब कोई सवाल गिरते-पड़ते  आप तक पहुँचे , तो सतरंगी शहर की सैर करा देते हो। सत्तर की उम्र में  पचास साल बाद के वादे कर देते हो। आप भी मजाक अच्छा करते हो जी,  सब चंगा जी!

घंटी बजी-

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घंटी बजी— थाली बजाओ, तिरंगा फहराओ, उम्मीद वाला, आशीर्वाद वाला दिया जलाओ। जनता हाज़िर है सरकार, कहो अपनी बात मन की बात- बेख़ौफ़ होकर सुनाओ!

चलो बापू को पढ़ते हैं

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चलो बापू को पढ़ते हैं। एक दिन नहीं, नित्य ही सत्य-अहिंसा के विचारों पर समूची दुनिया नत्मस्तक है बापू के जैसे प्रेम पथ चलते हैं। बन्धु सूत्र में विश्व को बांधे कर्तव्य परायणता धर्म मानें जन-जन के प्रेरणास्त्रोत हैं अंतिम-व्यक्ति की चेतना जगाते बापू के जैसे हम भी पहुंचते हैं। समय की सीमा से परे जन्म-मरण का चक्र तोड़े इतिहास की बोगी में बापू नर से नारायण बने बापू के जैसे महात्मा बनते हैं। दांडी की शांति यात्रा थमी अच्छाई भी राह भटकी मानवता किताबी न बन जाए हरि कहीं मूरत में न रह जाए चलो अहिंसा का बीज उगाते हैं। मानवता का प्रमाण दें भूल के सारे द्वेष धरकर बापू का भेष मन, क्रम, वचन से एक बापू के जैसे सदाचारी बनते हैं।

ए वतन मेरे

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वतन है तो हम हैं वरना कुछ भी नहीं! माँ के आँचल से शीतल महबूब के ऑंखों से गहरा ए वतन मेरे, ए वतन मेरे! मैं सात समंदर पार से, सब छोड़ के, लौट आती हूँ; पास तेरे, ए वतन मेरे। कुछ अधूरी सी आँखों में, दिल में, रह जाती है; प्यास तेरे, ए वतन मेरे। कितने रंग और रूप यहाँ, भाषा और बोलियाँ खुब यहाँ,  प्रेम का सागर; पास तेरे, ए वतन मेरे। दादी-नानी की बातों में,  चाँद-तारों वाली रातों में,  बुनें सपने सुहाने, साथ तेरे, ए वतन मेरे। मखमल सी हरियाली, शतरंगी चूनर लहराती, ये बगीयाँ, नजारे; सब रास तेरे, ए वतन मेरे।  रंग बिरंगे फूल का,  ये देश गुलीस्ताँ, सारे जग से प्यारा, मेरा हिन्दूस्ताँ, जीवन के रंग में; अहसास तेरे, ए वतन मेरे। इतिहास है गौरवशाली, जन्मभूमि है वीरों की मेरा हर जन्म; मेरी हर साँस तेरे, ए वतन मेरे। कान्हा की बंसी, डाली सावन की,  हर ताल पे; सात सूर के साज तेरे; ए वतन मेरे।  आबाद रहे खुशहाल रहे, सारे जहाँ में तू बेमिसाल रहे, तेरी सदा जयकार हो, सूरज-चाँद मेरे,  ए वतन मेरे। ए वतन मेरे, ए वतन मेरे।।

सपनों का शहर !

बेरंग ज़िन्दगी में रंग भरेगा कौन। सपनों की नगर में बसेगा कौन। हर कोई खड़ा है यहाँ खंजर लिए,  इस अंधेर नगरी में सुनेगा कौन। मार्ग सत्य,अहिंसा का हो या शैतानी,  इस शहर में संदेश सुनायेगा कौन। युद्ध-भूमि में बिलबिलाती भूख,  इस भुख की शब्दावली बदलेगा कौन। अच्छाई और बुराई के अपने-अपने दावे युद्ध के मैदान में जीतेगा कौन।  अब पीड़ा की गूँज कहीं पहुँचती नहीं,  "नृशंसताओं,, की रूह को खोजेगा कौन।

नये युग की शक्ति!

लड़कियों ने बदल लिए हैं रास्ते, तुम्हारे और अपने वास्ते। अब द्रौपदी ने पासे सँभाल लिए हैं। वह बन गई है प्रहरी अपनी स्वयं की । सीता को अब भी स्वर्ण-मृग लुभाता है, अब वो लकीर है स्वयं आत्मसम्मान की  । वह राष्ट्र के स्वप्नों की उजली ज्योति है, सीमा पर अडिग खड़ी प्रथम पंक्ति की शक्ति है। वह पालनहार है, ममता का अथाह सागर भी, समय पुकारे तो वज्र-सी प्रचंड हुंकार भी। अब वह केवल अपना नहीं, समूचे युग का दायित्व संभालती है; झाँसी की रानी सी ज्वाला। अपने भीतर जगा ली है  अब वह किसी कथा की पात्र नहीं, स्वयं महाकाव्य का उद्घोष है। वह इतिहास के पन्नों में नहीं  स्वयं इतिहास का शब्दकोश है। वह भविष्य की रचयिता है, वह परिवर्तन का विश्वास है; अब किसी युग की प्रतीक्षा नहीं, स्वयं नये युग का आरंभ है। लड़कियों ने बदल लिए हैं रास्ते, अपने और आने वाले समय के वास्ते।

बदलाव की धाराएँ!

एक छोटी-सी, पतली-सी धारा, जब अनगिनत धाराओं में मिलती है, तब जन्म लेती है एक नदी। फिर  नदी अपने प्रचंड वेग में बड़े-बड़े साम्राज्यों को बहा ले जाती है। पीछे छोड़ जाती है एक उपजाऊ भूमि, जिसकी गोद में नई पीढ़ियाँ बोती हैं अपनी सभ्यता के बीज।