आकाश के पथिक
सुनो—
हाँ, कहो।
तुम्हें क्या लगता है,
ये बादल स्वतंत्र हैं?
हाँ, दिखते तो हैं।
क्षितिज से क्षितिज तक भटकते,
पर्वतों की चोटियाँ लाँघते,
सात सागरों की नीरवता पर अपनी छाया बिछाते।
जहाँ चाहें ठहर जाएँ;
जहाँ चाहें बरस जाएँ।
पर क्या सचमुच?
मैं देखती हूँ,
उनकी इस असीम यात्रा के भीतर
एक मौन बंधन भी है।
वे उड़ते अवश्य हैं,
पर केवल उड़ने के लिए नहीं;
वे भटकते अवश्य हैं,
पर केवल भटकने के लिए नहीं।
अंततः उन्हें लौटना होता है
उस प्यास के पास,
जिसके लिए वे जन्मे हैं।
उनका समस्त विस्तार,
उनकी समस्त स्वतंत्रता,
एक करुण दायित्व में आकर विलीन हो जाती है—
धरती की सूखी देह पर जल की बूँद बनकर।
बादल भी अंत में वही करते हैं,
जिसके लिए वे बने हैं। 🌧️✨
Comments