जीवन - मैं हाज़िर हूँ!

लम्हा लम्हा एक कहानी,
यादों की है रवानी।
एक पल हँसते, एक पल रोते,
यही ज़िंदगी की जुबानी।

अनकहे पल, कुछ ख़्वाब अधूरे,
गिरती-सँभलती ज़िंदगानी।
क्या तुम्हें याद है, ऐ रुतबा-ए-तजुर्बा,
हर ठोकर ने लिखी मेरी कहानी।

न शिकायत, न गिला कोई,
जो मिला, वही तकदीर मानी
ढलती शाम भी दे गई पैग़ाम,
हर सुबह रोशनी की दीवानी।"

जो खोया, उसने कुछ सिखाया,
जो पाया, उसकी क़दर जानी।
लम्हा लम्हा एक कहानी,
यही तो है ज़िंदगी की निशानी।

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