जीवन—एक निजी किताब!
ये जीवन है—
ये ग़लत कैसे हो सकता है?
ये तो ठीक वैसा ही है,
जैसा इसे होना है।
ये इस पर निर्भर करता है कि तुम इसके किस पाठ का हिस्सा बनते हो,
किस अध्याय में अपना किरदार निभाते हो
और उसे किस तरह निभाते हो।
तुम इसे स्वीकार भी कर सकते हो
और दरकिनार भी।
ये तुम पर और तुम्हारी बुद्धि पर निर्भर करता है।
तुम जो भी चुनोगे,
उस चुनाव से मिलने वाली चुनौतियों के लिए
तुम स्वयं जिम्मेदार होगे।
जीवन की परिस्थितियाँ कभी-कभी
तुम्हें तोड़ देती हैं,
तुम्हें निराशा के दलदल में धकेल देती हैं।
लेकिन तुम उन्हें स्वीकार कर
धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहते हो।
और ज्यों-ज्यों तुम आगे बढ़ते जाते हो,
ज़िंदगी तुम्हारे सामने
एक-एक करके अपने अनगिनत रहस्यों से पर्दा उठाती जाती है।
दरअसल, वह तुम्हें कुछ नया नहीं दे रही होती—
वह तो तुम्हारे भीतर पहले से छिपी
तुम्हारी शक्तियों को जाग्रत कर रही होती है।
जब तुम एक लंबा रास्ता तय करके
एक दिन पीछे मुड़कर देखते हो,
तो तुम्हें स्वयं पर यकीन नहीं होता
कि यह वही तुम हो
जो कभी इन रास्तों से गुजर रहा था।
और जब तुम अपने संघर्षों को देखते हो,
तो अपने भीतर एक ऐसे इंसान को पाते हो
जिसकी शक्ति से तुम स्वयं अनजान थे।
शायद जीवन इसी तरह काम करता है।
वह हमें तोड़कर बनाता है,
गिराकर उठना सिखाता है,
और संघर्षों के रास्ते
हमारी अपनी पहचान से हमारा परिचय कराता है।
संघर्ष जितना गहरा होता है,
आत्मबोध उतना ही गहरा होता जाता है।
और जब इंसान अपने भीतर की शक्ति को पहचान लेता है,
तब उसे समझ आता है—
जीवन को पूर्ण होने के लिए
किसी और चीज़ की आवश्यकता नहीं थी।
जीवन हमेशा से पूर्ण था।
बस, हमें उसकी पूर्णता को समझने के लिए
उसकी यात्रा से गुजरना था।
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