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गुरु कृपा

गुरु बिन घट अँधियार है, गुरु बिन सूझे न राम। गुरु कृपा जब बरसती, जगमग होय धाम॥ गुरु सोई जो राम दे, काटे मन की फाँस। जीवन सार्थक हो उठे, मिटे जन्म की प्यास॥ गुरु चरणन की धूलि से, निर्मल होय विचार। मन-मंदिर में राम बसें, मिटे सकल अँधियार॥ गुरु गोविंद एक रस, भेद न मानै कोय। जिन अंतर अनुभव भयो, तिन परम सुख होय॥ "कबीर जी की शैली से प्रेरित मौलिक दोहे"

क्रांति

एक छोटी-सी, पतली-सी धारा, जब अनगिनत धाराओं में मिलती है, तब जन्म लेती है एक नदी। फिर  नदी अपने प्रचंड वेग में बड़े-बड़े साम्राज्यों को बहा ले जाती है। पीछे छोड़ जाती है एक उपजाऊ धरती, जिसकी गोद में नई पीढ़ियाँ अपनी सभ्यता के बीज बोती हैं।

युवा शक्ति

युवा जब मुस्कुराता है, तब राष्ट्र आगे बढ़ता जाता है। युवा अपने ही भविष्य के लिए जब सड़क पर उतर आए। यह केवल उसका संघर्ष नहीं, देश के भविष्य की  पुकार है। जो मौन हैं— वे भी इस आंदोलन का हिस्सा हैं, उनकी खामोशी— समय की सबसे गहरी गवाही है, वे तुम्हें देख रहे हैं— तुम्हारी हर आवाज़ सुन रहे हैं, वे प्रतीक्षा में हैं— सरकार के व्यवहार की, क्योंकि.... इतिहास गवाह है— बदलाव का सबसे निर्णायक मोड़ सत्ता के फैसलों पर निर्धारित होता है।

प्राथना 🙏

हे माँ काली! मेरे भीतर के भय को  साहस में, अज्ञान को  ज्ञान में, क्रोध को  करुणा में, और अहंकार को  विनम्रता में बदल दीजिए। मेरे जीवन में सत्य,  शक्ति और  सद्बुद्धि का  प्रकाश बना रहे। जय माँ काली। 🌺

आकाश के पथिक

सुनो— हाँ, कहो। तुम्हें क्या लगता है,  ये बादल स्वतंत्र हैं? हाँ, दिखते तो हैं।  क्षितिज से क्षितिज तक भटकते,  पर्वतों की चोटियाँ लाँघते,  सात सागरों की नीरवता पर अपनी छाया बिछाते। जहाँ चाहें ठहर जाएँ;  जहाँ चाहें बरस जाएँ। पर क्या सचमुच? मैं देखती हूँ,  उनकी इस असीम यात्रा के भीतर  एक मौन बंधन भी है। वे उड़ते अवश्य हैं,  पर केवल उड़ने के लिए नहीं;  वे भटकते अवश्य हैं,  पर केवल भटकने के लिए नहीं। अंततः उन्हें लौटना होता है  उस प्यास के पास,  जिसके लिए वे जन्मे हैं। उनका समस्त विस्तार,  उनकी समस्त स्वतंत्रता,  एक करुण दायित्व में आकर विलीन हो जाती है— धरती की सूखी देह पर जल की बूँद बनकर। बादल भी अंत में वही करते हैं,  जिसके लिए वे बने हैं। 🌧️✨

क्रोध-करुणा की यात्रा!

मनुष्य का जीवन संबंधों की डोर से बँधा होता है। परिवार, पड़ोस और समाज—यही हमारे रोज़मर्रा के संसार की संरचना करते हैं। लेकिन जब इन्हीं संबंधों में बार-बार लड़ाई, कटु शब्द और क्रोध प्रवेश कर जाता है, तब जीवन की शांति धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। अक्सर ऐसा होता है कि किसी दिन घर या आस-पड़ोस में विवाद हो जाता है। उस समय आवेश में कही गई बातें उस पल को तो पार कर देती हैं, लेकिन उनका वास्तविक प्रभाव अगले दिन दिखाई देता है। सुबह उठते ही जब हम फिर उसी व्यक्ति का चेहरा देखते हैं, जिससे कल तकरार हुई थी, तो मन में अनायास क्रोध जाग उठता है। नकारात्मक विचार हमारे मस्तिष्क में प्रवेश कर जाते हैं और पुरानी बातों को बार-बार दोहराने लगते हैं। यही क्रम यदि लगातार चलता रहे, तो कुछ ही दिनों में एक और लड़ाई होना स्वाभाविक हो जाता है। धीरे-धीरे यह स्थिति जीवन की आदत बन जाती है। क्रोध, नाराज़गी, गलत विचार और कठोर शब्द हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। परिणामस्वरूप हमारा आचरण भी बिगड़ने लगता है। हम यह भूल जाते हैं कि जैसी हमारी सोच होती है, वैसा ही हमारा व्यवहार बनता है, और वही व्यवहार हमारे जीवन की दिशा त...

“दस्तक निषेध है”

मैं भूली नहीं बीती बातें, उन पर बस मिट्टी डाली है। अपनी आदतों से उन्हें यूँ सींचा न करो। दर्द की आँधियाँ छुपाए हूँ, इस दिल पर दस्तक बेवजह किया न करो। असलीयत पर पर्दे गिराए रखे हैं, तुम झोंके की तरह यूँ आया–जाया न करो। औरत के रूप अनेक घर सोहे  लक्ष्मी रुप, तुम चण्ड-मुण्ड बना न करो।