खुद को जानने से पहले मुझे लगा— पूरी दुनिया सिर पर उठा लूँ, थोड़ी-सी नादान बन जाऊँ, सारे रिश्तों को तराजू पर तोल लूँ। बिना पंखों के आसमान में उड़ जाऊँ, चाय में चीनी की जगह नमक मिला दूँ, सपनों को हवा में उड़ा दूँ, सतरंगी इंद्रधनुष के उस पार चली जाऊँ। क्योंकि… जब मैं खुद को जान लूँगी— मेरे कुछ नियम होंगे, कायदे-कानून होंगे, सीमाएँ होंगी— सभ्यता के नाम पर, संस्कारों के नाम पर, आत्मसम्मान के नाम पर, आस्था के नाम पर, और न जाने किस-किस नाम पर। जिन्हें मैं थोपूँगी— खुद पर, समाज पर, परिवार पर, भगवान पर, समय पर। तब मेरे उड़ते हुए सपने मुझसे टकराएँगे और शायद मैं छोड़ दूँगी वह घुटन— जिसने बहुत समय से मेरी साँस रोक रखी है।