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गिद्ध

आसमान में उड़ने वाले गिद्ध सांसों के थमने का इंतजार तो करते हैं। ये जो जमीन पर झपट्टने वाले गिद्ध हैं ना, इनके बारे में कुछ कहने से पहले शब्द भी दम तोड़ देते हैं। इनकी पकड़ लकड़बग्घे के झपट से भी मजबूत है, शिकार के मिलते ही नोचना शुरू करते हैं। सांसों के रहते ही, बोटी बोटी नोचते हैं। यह सिलसिला पंचतत्व में विलीन होने के बाद भी जारी रखते हैं। किसी की सांसें अब भी बच गई हो तो, गिद्ध कहते हैं। खुश रहो तुम जिंदा हो, सवाल पूछने का हक तो मरे हुए को भी नहीं देते हैं। क्योंकि… गलती तुम दोनों की है।

हमसफर

हमसफर मेरे हमसफर साथ तेरा यूँ ही उम्र भर।। तू आकाश नीला मैं चंचल सी हवा, तू बदरा पिया मैं प्यासी धरा। यूँ ही साथ रहें हम उम्र भर। हमसफर मेरे हमसफर।। तुम बाग का हर रंग मैं तितली बेरंग, मेरे सनम तेरे संग जीवन का हर रंग। इन्द्रधनुषी हो गई डगर। हमसफर मेरे हमसफर।। मैं ओश की बूूँद तुम सूर्य तारा, मैं जुगनू तुम अंधियारा, मैं जल की धारा तुम हो किनारा। बहती रहूँ यूँ ही बेखबर। हमसफर मेरे हमसफर।। साथ तेरा यूँ ही उम्र भर।।

सरकार आपकी बेरूखी याद रखेंगे।

सरकार आपकी बेरूखी याद रखेंगे। हर कुर्बानी हर शहादत याद रखेंगे, नेताओं की नेता नगरी में अन्नदाता की पुस की वो चाँदनी रात याद रखेंगे, सिंहासन पर बैठी सरकार सुनो हम अन्नदाता के अँसुपात याद रखेंगे। राजपथ झाँकियाँ और अन्नदाता की रैली गणतंत्रदिवस इक्कीस की प्रभात याद रखेंगे। जब रद्दी हुई दौलत मेरी चारों पहर के वो हालात याद रखेंगे। राम जी की गद्दी, मुद्दा तीन सौ सतर राजनीति के तराजू से निजात याद रखेंगे। सुनसान सड़कों पर मीलों चलते लोग पाँव तले छालों की अधरात याद रखेंगे। तालाबंदी, दो गज की दूरी, ढका मुखड़ा बीस की टीस का आघात याद रखेंगे। बेरोजगारी, महंगाई, जनता का विरोध आत्मनिर्भरता से मन की बात याद रखेंगे। जिस काले चश्मे से सब चंगा दिखता है सरकार आपकी हर करामात याद रखेंगे। सख्त नियम से कानून जो लागू हुए  सरकार जल्दबाजी की सौगात याद रखेंगे । आवाज बुलंद भी करेंगे और सवाल भी पूछगें सरकार आपके ख़यालात याद रखेंगे। हमारे हर सवाल हर विरोध पर आपका इतिहास की खैरात याद रखेंगे सरकार आपकी बेरूखी याद रखेंगे। पुस की वो चाँदनी रात याद रखेंगे, 

मदारी

एक मदारी, बड़ा खिलाड़ी डुगडुगी बजाके खेल दिखाए उसके इशारे पे नाची बंदरिया तमाशा देखे सारी नगरिया। बातों का जादूगर सपनों का सौदागर अपनी धुन पर नाच नचाए अपने सूर वो आप सुनाए हुआ अंधेरा उठाकर झोला दिनभर का खिलाड़ी  घर लौटा थका मदारी।।

एक शिकारी बड़ा सयाना!

एक शिकारी बड़ा सयाना डाले भ्रम का दाना, जाल ऐसा डाला फस गया जंगल सारा, मची हुई है भगदड़ हो रहा है दंगल, हो गया है व्यापार बड़ा डर का कारोबार खड़ा फायदे की है साझेदारी  करे यहाँ सभी होशियारी, क्या कबूतर क्या शिकारी बचने की है पूरी तैयारी,  भूला दी है दुनियादारी सबको अपनी जान है प्यारी, ढुंढ रहे हैं सभी अनाड़ी यहाँ सभी हैं खिलाड़ी, विभिन्न-विभिन्न जाल बदले भाँति-भाँति की चाल चले, मनसुबों का नहीं ठिकाना ये शिकारी बड़ा सयाना।।

अन्नदाता

ऐसा भी एक दिन था, जब देश के खातिर भुखे ने भी उपवास रखा, देश के पहले नागरिक ने अपने आँगन में हल चलाया, तब लेकर हरित क्रांति की मिसाल किसान ने धरती से सोना उगाया, देश को अन्न का भंडार दिया, भूख से नाता तोड़ दिया, ये किसान है  माटी का लाल है दो धारी तलवार है कर ना साजिशें नीति बीच की। सत्य है  शाश्वत है ये वार पे वार सब बेकार है। देश का स्तंभ, इसे मौसमों से ना डरा, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर, दिन-रात, खेत-खलयान, खुला आसमान, सब हैं इसके सखा। हर गीत में, प्रीत में बसी है इसकी कथा। ये है  मेरा ''अन्नदाता'' "अन्नदाता सुखी भव" "अन्नदाता सुखी भव"               "अन्नदाता सुखी भव" 8/12/20 "किसान आंदोलन "

दीप

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एक दीप रोशनी से भरा, दसों दिशाँ प्रकाशित करे। हर्ष और उल्लास से, नव जीवन प्रतिष्ठित करे। एक दीप उमंग से भरा, भक्ति में रंगा जो अंतर्मन तलक, निर्भय और जागृति करे। अंधकार में, आशा की किरणें उम्मीद और विश्वास की, शक्ति सदा प्रज्वलित करे। समय के  चक्र में, घटित घटनाओं में मानव के हृदय को, संताप में आनंदित करे। मेरा कोटी कोटी नमन उस दीप को उस वीर को जो जन कल्याण में अपना सर्व जीवन समर्पित करे। एक दीप रोशनी से भरा, दसों दिशाँ प्रकाशित करे। हर्ष और उल्लास से, नव जीवन प्रतिष्ठित करे।