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विरासत

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मैंने भी दर्ज करा दिया अपना नाम इतिहास के पन्नों पर, स्याही से नहीं— अपने हौसलों की आग से, अपने सपनों की उड़ान से। अब जब भी वक़्त के पन्ने पलटे जाएँगे, मेरी कहानी के साथ मेरे संघर्षों की बात होगी, मेरी जीत की बात होगी। और शायद मेरी सबसे बड़ी जीत सिर्फ़ मेरा इतिहास बन जाना नहीं— बल्कि यह होगी कि जब कोई अगली पीढ़ी मेरे पन्ने पढ़ेगी, तो उसकी आँखों में मेरा सपना  एक नया सपना बनकर जन्म लेगा।               " नेहा बोरा,,

जीवन - मैं हाज़िर हूँ!

लम्हा लम्हा एक कहानी, यादों की है रवानी। एक पल हँसते, एक पल रोते, यही ज़िंदगी की जुबानी। अनकहे पल, कुछ ख़्वाब अधूरे, गिरती-सँभलती ज़िंदगानी। क्या तुम्हें याद है, ऐ रुतबा-ए-तजुर्बा, हर ठोकर ने लिखी मेरी कहानी। न शिकायत, न गिला कोई, जो मिला, वही तकदीर मानी ढलती शाम भी दे गई पैग़ाम, हर सुबह रोशनी की दीवानी।" जो खोया, उसने कुछ सिखाया, जो पाया, उसकी क़दर जानी। लम्हा लम्हा एक कहानी, यही तो है ज़िंदगी की निशानी।

जीवन—एक निजी किताब!

ये जीवन है— ये ग़लत कैसे हो सकता है? ये तो ठीक वैसा ही है, जैसा इसे होना है। ये इस पर निर्भर करता है कि तुम इसके किस पाठ का हिस्सा बनते हो, किस अध्याय में अपना किरदार निभाते हो और उसे किस तरह निभाते हो। तुम इसे स्वीकार भी कर सकते हो और दरकिनार भी। ये तुम पर और तुम्हारी बुद्धि पर निर्भर करता है। तुम जो भी चुनोगे, उस चुनाव से मिलने वाली चुनौतियों के लिए तुम स्वयं जिम्मेदार होगे। जीवन की परिस्थितियाँ कभी-कभी तुम्हें तोड़ देती हैं, तुम्हें निराशा के दलदल में धकेल देती हैं। लेकिन तुम उन्हें स्वीकार कर धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहते हो। और ज्यों-ज्यों तुम आगे बढ़ते जाते हो, ज़िंदगी तुम्हारे सामने एक-एक करके अपने अनगिनत रहस्यों से पर्दा उठाती जाती है। दरअसल, वह तुम्हें कुछ नया नहीं दे रही होती— वह तो तुम्हारे भीतर पहले से छिपी तुम्हारी शक्तियों को जाग्रत कर रही होती है। जब तुम एक लंबा रास्ता तय करके एक दिन पीछे मुड़कर देखते हो, तो तुम्हें स्वयं पर यकीन नहीं होता कि यह वही तुम हो जो कभी इन रास्तों से गुजर रहा था। और जब तुम अपने संघर्षों को देखते हो, तो अपने भीतर एक ऐसे ...

हर मौसम बदल जाता है।

सुख -दुःख आता जाता है, केवल मन भरमाता है। मन तू इतना क्यों घबराए, हर मौसम बदल जाता है। कभी धूप है कभी छाँव है, जीवन यूँ ही चलता जाता है। जो आया है वो जाएगा  समय कहाँ रुक पाता है। मन तू इतना क्यों घबराए, हर मौसम बदल जाता है।

"मैं" की यात्रा।

खुद को जानने से पहले मुझे लगा— पूरी दुनिया सिर पर उठा लूँ, थोड़ी-सी नादान बन जाऊँ, सारे रिश्तों को तराजू पर तोल लूँ। बिना पंखों के आसमान में उड़ जाऊँ, चाय में चीनी की जगह नमक मिला दूँ, सपनों को हवा में उड़ा दूँ, सतरंगी इंद्रधनुष के उस पार चली जाऊँ। क्योंकि… जब मैं खुद को जान लूँगी— मेरे कुछ नियम होंगे, कायदे-कानून होंगे, सीमाएँ होंगी— सभ्यता के नाम पर, संस्कारों के नाम पर, आत्मसम्मान के नाम पर, आस्था के नाम पर, और न जाने किस-किस नाम पर। जिन्हें मैं थोपूँगी— खुद पर, समाज पर, परिवार पर, भगवान पर, समय पर। तब मेरे उड़ते हुए सपने मुझसे टकराएँगे और शायद मैं छोड़ दूँगी वह घुटन— जिसने बहुत समय से मेरी साँस रोक रखी है।

गुरु कृपा

गुरु बिन घट अँधियार है, गुरु बिन सूझे न राम। गुरु कृपा जब बरसती, जगमग होय धाम॥ गुरु सोई जो राम दे, काटे मन की फाँस। जीवन सार्थक हो उठे, मिटे जन्म की प्यास॥ गुरु चरणन की धूलि से, निर्मल होय विचार। मन-मंदिर में राम बसें, मिटे सकल अँधियार॥ गुरु गोविंद एक रस, भेद न मानै कोय। जिन अंतर अनुभव भयो, तिन परम सुख होय॥ "कबीर जी की शैली से प्रेरित मौलिक दोहे"

क्रांति

एक छोटी-सी, पतली-सी धारा, जब अनगिनत धाराओं में मिलती है, तब जन्म लेती है एक नदी। फिर  नदी अपने प्रचंड वेग में बड़े-बड़े साम्राज्यों को बहा ले जाती है। पीछे छोड़ जाती है एक उपजाऊ धरती, जिसकी गोद में नई पीढ़ियाँ अपनी सभ्यता के बीज बोती हैं।