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कुंभ दर्शन

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पाप-पुण्य तो भगवन जाने   स्वर्ग-नरक से क्या है लेना, जन्म-मृत्यु के चक्र से  मोक्ष किसे है पाना, इस पावन धरती पर  जनम लूँ मैं बार-बार  कुंभ के संगम पर डुबकी का सौभाग्य है पाना। भक्ति-भाव से भरे घाट फूलों से नहाई त्रिवेणी,  साधु-संतों के उद्घोष भरा ये सभ्यता है सनातन की, ये भव्यता, ये दिव्यता  कितना अद्भुत-अलौकिक अतुल्य, परम्-आनन्दित एक में अनेक है, अनेक में एक  इस एक से एकाकार है होना, साधु-संत, सन्यासी और गृहस्थी  सबका एक भाव में होना, बनकर कल्पवासी  मन का अमृत्व को पाना  जीवन का अमृतमय हो जाना इस कुंभ  का साक्षी होना तीर्थराज प्रयाग में मानो जैसे देवलोक आना। जैसे परमपिता के धाम पहुंचना।

सूखे सफ़ेद गुलाब!

सूखे सफ़ेद गुलाब! सदियों पहले अस्त हुई मेरे मुख की हँसी को  दिल के अहसास को  मेरे भाव को क्या दिनकर लौटा पाएगा ? मेरे अंंतर मन की  मरती हुई मेरी चेतना को  मेरी इच्छा को  मेरे सपनों को  क्या ये फूल खिला पाएगा ? एक विशाल-विरान रेगिस्तान से जीवन को  एक सुखी बंजर जमीन को  नीरस‌ दरख़्त को क्या ये सावन भिगा पाएगा ? मेरे शरीर को नौचते श्रापित मनुष्य को  सिसकती, बेबस सांसों को  आँखों पे पट्टी बाँधे मूकदर्शक को क्या समय सब भुला पाएगा ? हे कण-कण में बसने वाले! अपने इस अन्श को मेरी माँ की कोख को  मेरे पिता के लाड को क्या इंसाफ दिला पाएगा ?

एक बार निश्चय कर देख।

रोज-रोज दो कदम चलकर  एक बार घर से निकलकर देख, अगर लम्बा हो सफ़र तो दो-चार ठोकर खाकर देख, मजबूरियों के शीशे तोड़कर  मील के पत्थर को छूकर देख, बसाए हो सपने ज़हन में अगर एक बार जीवन में उतार कर देख, जिस राह पर भविष्य ना दिखे  बदलने का जोखिम लेकर देख, फीकी पड़ गई हो तस्वीर अगर एक बार और रंग भरकर देख, जब समय तेरे विपरीत चले तू अपनी चाल बदलकर देख, पाओगे खुद को सबसे आगे  एक बार निश्चय कर देख।।

ज़िन्दगी एक खेल है!

किस्मत पासे फैंकती, समय चले चाल अपनी मर्ज़ी मन करे, बुद्धि बने है ढाल।। अनुभवों से ज्ञान मिला, विचार का जंजाल  उत्सुक और विवेक का , खेल है बेमिसाल।। ज्ञानी हो या अज्ञानी, अमीर या कंगाल  सबके सब है खेलते, दिन महीने व साल।। उम्र सारी बीत गई, न छूटा मोहजाल  समझ-समझ के न समझे, मृत्युलोक का जाल।। मौसम अहसासों भरा, चाह का भक्तिकाल  पहेली है दिन-रात की, बीता जीवनकाल।।

भटकन

जब भटकन मुझे थका देती है, तो मैं ठीक उस बच्चे की तरह, जो गिरने के बाद फिर से उठकर, पूरे उत्साह से भागने लगता है। ठीक वैसे ही, मैं भी फिर अपने राह पर चलने लगती हूँ।  क्योंकि!  जो पहले से ज्यादा आर्कषित और ज्यादा थका देने वाली, आगे एक और भटकन मेरा इंतजार कर रही होगी।

राजनीति का खेल

राजनीति! इस खेल में किसी भी बात की  कोई भी सीमा कहाँ होती है,  यहाँ तो बस पासे पे पासे फैंके जाते हैं, ना ही जीत का ना ही हार का  कोई मतलब रहता है।  यहाँ जो अंत तक  बेहतर खेलेगा;  वहीं विजेता कहलायेगा,  और वही सही साबित होगा।

आलस

आलस-- जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप, खत्म कर दे जो  भूत, भविष्य और वर्तमान,  पूर्वजों की समृद्धि-स्वाभिमान। तुम्हारे अन्दर पल रहे महात्मा गांधी, गौतम बुद्ध, महावीर, कृष्णा जैसी सम्भावना, तुम्हारी ईच्छाएँ , सपने, कर्म,भाव,  एक अकल्पनीय बुद्धि ऊर्जावान। प्रेम से भरा मन और शक्तिशाली तन   एक शानदार व्यक्तित्व,  खत्म कर दे जो सारा अभिमान। आलस !  जीवन बना दे श्मशान  ( जहाँ सिर्फ राख ही राख है)।।