एक बार निश्चय कर देख।


रोज-रोज दो कदम चलकर 
एक बार घर से निकलकर देख,
अगर लम्बा हो सफ़र तो
दो-चार ठोकर खाकर देख,
मजबूरियों के शीशे तोड़कर 
मील के पत्थर को छूकर देख,
बसाए हो सपने ज़हन में अगर
एक बार जीवन में उतार कर देख,
जिस राह पर भविष्य ना दिखे 
बदलने का जोखिम लेकर देख,
फीकी पड़ गई हो तस्वीर अगर
एक बार और रंग भरकर देख,
जब समय तेरे विपरीत चले
तू अपनी चाल बदलकर देख,
पाओगे खुद को सबसे आगे 
एक बार निश्चय कर देख।।

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