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जय हिन्द

क्रोध-करुणा की यात्रा!

मनुष्य का जीवन संबंधों की डोर से बँधा होता है। परिवार, पड़ोस और समाज—यही हमारे रोज़मर्रा के संसार की संरचना करते हैं। लेकिन जब इन्हीं संबंधों में बार-बार लड़ाई, कटु शब्द और क्रोध प्रवेश कर जाता है, तब जीवन की शांति धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। अक्सर ऐसा होता है कि किसी दिन घर या आस-पड़ोस में विवाद हो जाता है। उस समय आवेश में कही गई बातें उस पल को तो पार कर देती हैं, लेकिन उनका वास्तविक प्रभाव अगले दिन दिखाई देता है। सुबह उठते ही जब हम फिर उसी व्यक्ति का चेहरा देखते हैं, जिससे कल तकरार हुई थी, तो मन में अनायास क्रोध जाग उठता है। नकारात्मक विचार हमारे मस्तिष्क में प्रवेश कर जाते हैं और पुरानी बातों को बार-बार दोहराने लगते हैं। यही क्रम यदि लगातार चलता रहे, तो कुछ ही दिनों में एक और लड़ाई होना स्वाभाविक हो जाता है। धीरे-धीरे यह स्थिति जीवन की आदत बन जाती है। क्रोध, नाराज़गी, गलत विचार और कठोर शब्द हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। परिणामस्वरूप हमारा आचरण भी बिगड़ने लगता है। हम यह भूल जाते हैं कि जैसी हमारी सोच होती है, वैसा ही हमारा व्यवहार बनता है, और वही व्यवहार हमारे जीवन की दिशा त...

“दस्तक निषेध है”

मैं भूली नहीं बीती बातें, उन पर बस मिट्टी डाली है। अपनी आदतों से उन्हें यूँ सींचा न करो। दर्द की आँधियाँ छुपाए हूँ, इस दिल पर दस्तक बेवजह किया न करो। असलीयत पर पर्दे गिराए रखे हैं, तुम झोंके की तरह यूँ आया–जाया न करो। औरत के रूप अनेक घर सोहे  लक्ष्मी रुप, तुम चण्ड-मुण्ड बना न करो।

हैलो दिसम्बर!

हैलो दिसम्बर, तो तुम जा रहे हो— हर बार की तरह दरवाज़े पर उम्मीद रखकर, और सपनों की गठरी मेरे कंधों पर टांगकर। बताओ, अगली बार भी क्या यूँ ही मिलोगे— कुछ बन जाने की हल्की-सी आग जलाकर, और अधूरे साहस को पूरा होने का बहाना देकर? इस बार साफ़-साफ़ कहो, बताओ— इस बार मैं क्या बनूँ? गुड़ की डली, या तीखी मिर्ची, या उड़ जाऊँ हवा के संग— या बेल बन जाऊँ? नये सितारों की चमक लेकर,  दुःख-पीड़ा से अंकुरित  नई कहानी लिखकर, समय रुकता नहीं, ये बताकर, कुछ भी स्थाई नहीं, ये समझाकर, सफ़र में मील का पत्थर बनकर, तो तुम जा रहे हो दिसम्बर।

दिमाग कहाँ है?

दिमाग कहाँ है? दिमाग कहाँ है? जहाँ होना चाहिए.... उसे छोड़कर— हर जगह है। न यथार्थ में है, न विचार में, न आत्मा के संकल्प में, न जीवन के विस्तार में। वो भटक रहा है — लोभ की गलियों में, झूठे सुख-सपनों की झिलमिल झाँझरों में, जहाँ न मौन है, न मंथन है। वो भाग रहा है  उन संकरी गलियों से  जहाँ ध्वजा लिए खड़े हैं प्रश्न ! वो ढुंढ रहा है—उत्तर  दक्षिण में,  भटक रहा है  पूरब और पश्चिम में। दिमाग ! तू कब लौटेगा उस स्थान पर जहाँ तुझे होना है? जहाँ तुझसे सृजन की आशा है, जहाँ विचार की ज्वाला है, जहाँ आत्मा की मशाल। आज तू है — पर नहीं है, जैसे दीपक हो, जिसमें बाती नहीं है। लौट आ, ओ चंचल चित्त अपने भीतर, जहाँ से तू  बदल सकता है संसार।

सपनों का शहर !

बेरंग ज़िन्दगी में रंग भरेगा कौन। सपनों की नगर में बसेगा कौन। हर कोई खड़ा है यहाँ खंजर लिए,  इस अंधेर नगरी में सुनेगा कौन। मार्ग सत्य,अहिंसा का हो या शैतानी,  इस शहर में संदेश सुनायेगा कौन। युद्ध-भूमि में बिलबिलाती भूख,  इस भुख की शब्दावली बदलेगा कौन। अच्छाई और बुराई के अपने-अपने दावे युद्ध के मैदान में जीतेगा कौन।  अब पीड़ा की गूँज कहीं पहुँचती नहीं,  "नृशंसताओं,, की रूह को खोजेगा कौन।

कुंभ दर्शन

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पाप-पुण्य तो भगवन जाने   स्वर्ग-नरक से क्या है लेना, जन्म-मृत्यु के चक्र से  मोक्ष किसे है पाना, इस पावन धरती पर  जनम लूँ मैं बार-बार  कुंभ के संगम पर डुबकी का सौभाग्य है पाना। भक्ति-भाव से भरे घाट फूलों से नहाई त्रिवेणी,  साधु-संतों के उद्घोष भरा ये सभ्यता है सनातन की, ये भव्यता, ये दिव्यता  कितना अद्भुत-अलौकिक अतुल्य, परम्-आनन्दित एक में अनेक है, अनेक में एक  इस एक से एकाकार है होना, साधु-संत, सन्यासी और गृहस्थी  सबका एक भाव में होना, बनकर कल्पवासी  मन का अमृत्व को पाना  जीवन का अमृतमय हो जाना इस कुंभ  का साक्षी होना तीर्थराज प्रयाग में मानो जैसे देवलोक आना। जैसे परमपिता के धाम पहुंचना।

सूखे सफ़ेद गुलाब!

सूखे सफ़ेद गुलाब! सदियों पहले अस्त हुई मेरे मुख की हँसी को  दिल के अहसास को  मेरे भाव को क्या दिनकर लौटा पाएगा ? मेरे अंंतर मन की  मरती हुई मेरी चेतना को  मेरी इच्छा को  मेरे सपनों को  क्या ये फूल खिला पाएगा ? एक विशाल-विरान रेगिस्तान से जीवन को  एक सुखी बंजर जमीन को  नीरस‌ दरख़्त को क्या ये सावन भिगा पाएगा ? मेरे शरीर को नौचते श्रापित मनुष्य को  सिसकती, बेबस सांसों को  आँखों पे पट्टी बाँधे मूकदर्शक को क्या समय सब भुला पाएगा ? हे कण-कण में बसने वाले! अपने इस अन्श को मेरी माँ की कोख को  मेरे पिता के लाड को क्या इंसाफ दिला पाएगा ?