हैलो दिसम्बर!
हैलो दिसम्बर,
तो तुम जा रहे हो—
हर बार की तरह
दरवाज़े पर उम्मीद रखकर,
और सपनों की गठरी
मेरे कंधों पर टांगकर।
बताओ, अगली बार भी
क्या यूँ ही मिलोगे—
कुछ बन जाने की
हल्की-सी आग जलाकर,
और अधूरे साहस को
पूरा होने का बहाना देकर?
इस बार साफ़-साफ़ कहो,
बताओ—
इस बार मैं क्या बनूँ?
गुड़ की डली,
या तीखी मिर्ची,
या उड़ जाऊँ हवा के संग—
या बेल बन जाऊँ?
नये सितारों की चमक लेकर,
दुःख-पीड़ा से अंकुरित
नई कहानी लिखकर,
समय रुकता नहीं, ये बताकर,
कुछ भी स्थाई नहीं, ये समझाकर,
सफ़र में मील का पत्थर बनकर,
तो तुम जा रहे हो दिसम्बर।
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