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हैलो दिसम्बर!

हैलो दिसम्बर, तो तुम जा रहे हो— हर बार की तरह दरवाज़े पर उम्मीद रखकर, और सपनों की गठरी मेरे कंधों पर टांगकर। बताओ, अगली बार भी क्या यूँ ही मिलोगे— कुछ बन जाने की हल्की-सी आग जलाकर, और अधूरे साहस को पूरा होने का बहाना देकर? इस बार साफ़-साफ़ कहो, बताओ— इस बार मैं क्या बनूँ? गुड़ की डली, या तीखी मिर्ची, या उड़ जाऊँ हवा के संग— या बेल बन जाऊँ? नये सितारों की चमक लेकर,  दुःख-पीड़ा से अंकुरित  नई कहानी लिखकर, समय रुकता नहीं, ये बताकर, कुछ भी स्थाई नहीं, ये समझाकर, सफ़र में मील का पत्थर बनकर, तो तुम जा रहे हो दिसम्बर।

दिमाग कहाँ है?

दिमाग कहाँ है? दिमाग कहाँ है? जहाँ होना चाहिए.... उसे छोड़कर— हर जगह है। न यथार्थ में है, न विचार में, न आत्मा के संकल्प में, न जीवन के विस्तार में। वो भटक रहा है — लोभ की गलियों में, झूठे सुख-सपनों की झिलमिल झाँझरों में, जहाँ न मौन है, न मंथन है। वो भाग रहा है  उन संकरी गलियों से  जहाँ ध्वजा लिए खड़े हैं प्रश्न ! वो ढुंढ रहा है—उत्तर  दक्षिण में,  भटक रहा है  पूरब और पश्चिम में। दिमाग ! तू कब लौटेगा उस स्थान पर जहाँ तुझे होना है? जहाँ तुझसे सृजन की आशा है, जहाँ विचार की ज्वाला है, जहाँ आत्मा की मशाल। आज तू है — पर नहीं है, जैसे दीपक हो, जिसमें बाती नहीं है। लौट आ, ओ चंचल चित्त अपने भीतर, जहाँ से तू  बदल सकता है संसार।

सपनों का शहर !

बेरंग ज़िन्दगी में रंग भरेगा कौन। सपनों की नगर में बसेगा कौन। हर कोई खड़ा है यहाँ खंजर लिए,  इस अंधेर नगरी में सुनेगा कौन। मार्ग सत्य,अहिंसा का हो या शैतानी,  इस शहर में संदेश सुनायेगा कौन। युद्ध-भूमि में बिलबिलाती भूख,  इस भुख की शब्दावली बदलेगा कौन। अच्छाई और बुराई के अपने-अपने दावे युद्ध के मैदान में जीतेगा कौन।  अब पीड़ा की गूँज कहीं पहुँचती नहीं,  "नृशंसताओं,, की रूह को खोजेगा कौन।

कुंभ दर्शन

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पाप-पुण्य तो भगवन जाने   स्वर्ग-नरक से क्या है लेना, जन्म-मृत्यु के चक्र से  मोक्ष किसे है पाना, इस पावन धरती पर  जनम लूँ मैं बार-बार  कुंभ के संगम पर डुबकी का सौभाग्य है पाना। भक्ति-भाव से भरे घाट फूलों से नहाई त्रिवेणी,  साधु-संतों के उद्घोष भरा ये सभ्यता है सनातन की, ये भव्यता, ये दिव्यता  कितना अद्भुत-अलौकिक अतुल्य, परम्-आनन्दित एक में अनेक है, अनेक में एक  इस एक से एकाकार है होना, साधु-संत, सन्यासी और गृहस्थी  सबका एक भाव में होना, बनकर कल्पवासी  मन का अमृत्व को पाना  जीवन का अमृतमय हो जाना इस कुंभ  का साक्षी होना तीर्थराज प्रयाग में मानो जैसे देवलोक आना। जैसे परमपिता के धाम पहुंचना।