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कुंभ दर्शन

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पाप-पुण्य तो भगवन जाने   स्वर्ग-नरक से क्या है लेना, जन्म-मृत्यु के चक्र से  मोक्ष किसे है पाना, इस पावन धरती पर  जनम लूँ मैं बार-बार  कुंभ के संगम पर डुबकी का सौभाग्य है पाना। भक्ति-भाव से भरे घाट फूलों से नहाई त्रिवेणी,  साधु-संतों के उद्घोष भरा ये सभ्यता है सनातन की, ये भव्यता, ये दिव्यता  कितना अद्भुत-अलौकिक अतुल्य, परम्-आनन्दित एक में अनेक है, अनेक में एक  इस एक से एकाकार है होना, साधु-संत, सन्यासी और गृहस्थी  सबका एक भाव में होना, बनकर कल्पवासी  मन का अमृत्व को पाना  जीवन का अमृतमय हो जाना इस कुंभ  का साक्षी होना तीर्थराज प्रयाग में मानो जैसे देवलोक आना। जैसे परमपिता के धाम पहुंचना।